बिन तेरे ज़िंदगी बिताना क्या।

बिन तेरे ज़िन्दगी बिताना क्या।
मंज़िलें गुम हुईं ठिकाना क्या।

फूल मुरझा के झड़ गए हैं अब,
ख़्वाब के रंग उड़ गए हैं अब,
इन निगाहों को कुछ दिखाना क्या।

लोग हँसते हैं दिल दुखाते हैं,
ज़ख्म को और छेड़ जाते हैं,
दर्द अहबाब को बताना क्या।

रोज़ो शब याद करता रहता था,
हर घड़ी आह भरता रहता था,
और करता तेरा दीवाना क्या।

©-चंदन डेहरिया

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